Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
भवेद्भ्रमात्मकमपि किंचिदर्थक्रियाकरम् ।
स्वप्नाङ्गनापि कुरुते सत्यामर्थक्रियां नृणाम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि जगत् असत् है तो वह व्यवहारार्थं क्रिया के योग्य केसे हैं, इस शंकापर कहते हैं /
कुछ भ्रमात्मक वस्तुएँ भी अर्थक्रियाकारी देखी जाती है, जैसे स्वप्न स्त्री असत्य होती हुई भी
मनुष्यों की सत्य वीर्यविसर्जनरूप अर्थक्रिया करती ही है