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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । सन्ति दुःखक्षयेऽस्माकं शास्त्रसत्सङ्गयुक्तयः । मन्त्रौषधितपोदानतीर्थपुण्याश्रमाश्रयाः ॥ १ ॥ कृमिकीटपतङ्गाद्यास्तिर्यक्स्थावरजातयः । कथं स्थिताः किमारम्भास्तेषां दुःखक्षयः कथम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

कृषि, कीट आदि अतिगूढ़ जन्दुओं का तो जीवन ही दुर्लभ हो जायेगा, क्योकि तात्कालिक द्रःखथान्ति का उपाय वहाँ है ही नहीं; उनमें ऐसी शक्ति है नहीं जिससे कि वे दुःखशान्ति का उपाय जान सके / ऐसी स्थिति में वे किस तरह जीते हैं यों श्रीरमजी उनकी संग्रारस्थिति को, जातिप्रसंग से, जानने की इच्छा से पूछते हैं / श्रीरामजी ने कहा : गुरुवर, हम मनुष्य-जाति के लोगों के दुःखक्षय के लिए तो शास्त्र, सत्संग, मन्त्र, औषधि, तप, दान, तीर्थ तथा पुण्याश्रम में निवास आदि उपाय हैं, परन्तु कृमि, कीट, पतंग आदि तथा तिर्यक्‌, स्थावर आदि जो जातियाँ हैं, उनका दुःखक्षय किस उपाय से होगा, उपाय के अभाव में उनका जीवनयापन कैसे ? यानी वे किस तरह जी सकते हैं ?

सर्ग सन्दर्भ

अद्ठानबेवाँ सर्ग समाप्त निन्नानवेवों सर्ग कृमि, कीट, पतंग, तिर्यग्योनि, स्थावर आदि जातियों का इस संसार मे जैसे भोग होता है, उन सबका वर्णन ।