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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

अन्तर्बहिस्त्वमहमित्यपि चैवमादि सर्वात्मकं तपति चिन्नभ एकमेव । शाखाशिखाविटपपत्रफलैकदेहः संकल्पवृक्ष इव बोधखमात्रसारः ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ की दृष्टि से तो केवल चिदाकाश ही "तुम" भे" आदिरूप सम्पूर्ण जगत बनकर प्रकाशमान होता है। देखिये न, आत्मा ही डालियाँ, उनकी चोटियाँ, उनकी टहनियाँ, उनके पत्तों और फलों के रूप-धारण द्वारा संकल्पवृक्ष बनकर मनोराज्य में प्रकाशमान होता है