Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verses 48–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verses 48–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 48,49
संस्कृत श्लोक
यत्तद्भानं तु सा चिद्भा परमं तच्चिदम्बरम् ।
इति क्वाहं क्व विश्वश्रीः क्व त्वं दृश्यदृशश्च काः ॥ ४८ ॥
मृत्वा पुनर्भवनमस्ति किमङ्ग नष्टं मृत्वा न चेद्भवनमस्ति तथापि शान्तिः ।
विज्ञानदृष्टिवशतोऽस्त्यथ चेद्विमोक्षस्तन्नेह किंचिदपि दुःखमुदारबुद्धेः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
अहम्“ आदि जगत् की शोभा ग्रतिभाम्रिक ही है, अन्य प्रकार की नहीं है जो जयत् का भान
है वह आत्मस्वरूप चैतन्य का प्रकाश ही है अन्य नहीं है / उतत भान का व्यावर्तक द्ृश्यकृप यदि
भान से पथक् माना जाय तो शून्य ही ठहरेया यदि भानरूप माना जाय, तो भानका व्यावर्तक न
होने से विदाकाशरुूप ही होगा, इस प्रकार विचार करने पर जगत् का रूप कुछ भी |भ्रिद्ध नहीं होता
ऐसी परिस्थिति में कहाँ में हुँ. कहाँ विश्वशोभा हैं, कहाँ आप हैं और द्श्यद्वष्टियाँ ही कौन हैं ?
हे श्रीरामचन्द्रजी, उदारमति आपकी, जो पूर्वोक्त विज्ञानदृष्टि से चिन्मात्र स्वरूप हैं, देह के
विनाश से मरकर फिर अन्य देह की उत्पत्ति से उत्पत्ति है यानी मुक्ति नहीं है तो क्या हानि हुई ?
क्योकि दुःखगन्धविहीन निरतिशय आनन्दरूप चैतन्य का नाश और उत्पत्ति से तनिक भी स्पर्श
नहीं है । यदि मरकर पुनः उत्पत्ति नहीं होती, मुक्ति होती है तो भी सर्वप्रपंच का उपशम ही है ।
इसलिए उक्त दोनों ही पक्षों में तनिक भी दुःख की प्राप्ति नहीं है