Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यादृगस्माकमीत्यर्थक्रमसंसारपातिनाम् ।
पदार्थवेदनं तादृक्तिरश्चां भ्रान्तमभ्रमम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व में जो यह कहा था कि हम लोगों की भोति ही पशु, गृगादि को भी संसार छुख और
द्ुःखदायक है, किन्तु वे पदार्थों के गुण, करियाउययोग (इसमें यह गुण है यह इस कार्य के उपयोगी
है) आदि विवेचन से, जिससे उत्कर्ष और अपकर्ष का ज्ञान होता हैं, सर्वथा कोरे हैं / इस बात को
उपपादन के द्वारा अनुभव में चढ़ाते हैं /
जैसे देशविपल्व के समय पलायन द्वारा दौड़ना आदि गति के लिए कुश, कोटे, जली हुई बालू
पर चलना, बोझ ढोना आदि मुसीबतों पर पड़े हुए हम लोगों को चारों ओर से भय की आशंकाओं
से पूर्ण पदार्थज्ञान होता है वैसा ही पदार्थज्ञान पक्षी, सर्प आदि तिर्यग्योनिवाले जीवों को भी सदा
होता है