Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
एवं मात्रापरिज्ञानमेवात्र प्रतिबोधकम् ।
अत्रैव तु परिज्ञानं कवाटप्रविघाटनम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब अस्त्य पदार्थ में अत्यन्त अप्राभिद्ध सत्यता की समानता का ग्रतिबोधक क्या होगा 2 ऐसी
आशंकापर स्वप्रकाश सत्यस्वरूप का अज्ञान ही अस्रत्यत्व में सत्यत्व के स्राद्ृश्य का ग्रतिबोधक हैं,
यह कहते हैं /
यथार्थरूप चिदानन्दरूप ब्रह्ममात्र विषयक अज्ञान ही जगत् में (असत्य में) सत्यत्व की समानता
का प्रतिबोधक है, अतएव तत्त्व का परिज्ञान ही आवरणरूप अज्ञानकपाट तथा विक्षेपरूप
जगत्सत्यताभ्रान्ति कपाट का उद्घाटन है