Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
जनो द्वीपान्तरं यादृग्विक्रीतः परिपश्यति ।
पदार्थजालं पश्यन्ति तादृक्पशुमृगादयः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हम लोगों के भोग्य, धट महल, धन आदि को वे कैसे देखते हैं; इसे कहते हैं /
जैसे बेचा गया पुरुष अन्य द्वीप को उदासीनता से मुग्धदृष्टि होकर देखता है, वैसे ही पशु, मृग
आदि उनके अभोग्य घर आदि पदार्थों को उदासीनता से मुग्धदृष्टि से देखते हैं