Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
पारिशेष्यान्न पृथ्व्यादि किंचित्संभवति क्वचित् ।
यो द्रष्टा यच्च वा दृश्यं विमलं शिवमेव तत् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान के कार्य के साथ अज्ञान का नाश होने पर
चिन्मात्र शेष रहने से पृथ्वी आदि किसी का कहीं पर संभव नहीं है । जो द्रष्टा है अथवा दृश्य है,
वह सब पूर्वोक्त परिशिष्ट चैतन्यमात्र विशुद्ध शिव ही है