Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

आपीननिद्रा वृक्षाद्याः स्वसत्तास्थास्तथाद्रयः । जङ्गमानि चिदाकाशं नाम किंचित्कदाचन ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

ङस प्रकार न तो वृक्ष आदि जीवों की द्रष्ट से जगत्‌ की कल्पना हो सकती है, क्योकि वे याढ़ निद्रा में मग्न हैं; न पर्वत आदि जीवों की द्रष्टि स़रे जयत्‌ की कल्पना हो स्रकती हैं, क्योंकि वे आत्मता में स्थित हैं; जगम जीवों में भी तत्वज्ञानियों की द्ष्टि से जगत्‌ की कल्पना नहीं हो सकती है, कारण वे तो विदाकाश स्वरुप ही हैं ह कुछ अज्ञानी जगम जीवो की द्रष्टि सने जगत की कल्पना हो सकती है, किंतु उनकी द्वष्टि उक्त बहुत से लोगो की द्ष्टि से विरुद्ध जगत्सत्ता की सिद्धि नहीं कर सकती, इस आशय से कहते हैं / वृक्ष आदि गाढ़ निद्रा में हैं और पर्वत आदि अपनी सत्ता में स्थित हैं। जो जंगम जीव हैं, वे भी सुषुप्ति, मरण, मूर्खा मोक्ष आदि अवस्थाओं में चिदाकाशरूप ही हैं । जंगम जीवों में से किन्हीं को कभी (स्वप्न में) अर्धविकास से और कभी (जाग्रत अवस्था में) पूर्ण विकास से भासमान भी जगत्‌ बहुतों की दृष्टि के अनुरोध से चिदाकाश ही है