Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 80
उन्नासीवाँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग पूर्व सर्ग में वैज्ञानिक तत्त्वदृष्टि से प्रलयक्रम का वर्णन हो चुका ।
51 verse-groups
- Verse 1अब योगिगम्य अन्य प्राकृत प्रलयक्रम का वर्णन। विधाता की कासना से कल्पित उनके लोक; देव, भुव…
- Verse 2इसके अनन्तर जब विधाता की देह मायाशबल ब्रह्मरूपता को प्राप्त हो गई तब पूर्वोक्त वे उन बारह…
- Verse 3आरन्धवश अधिकार का अन्त हो जाने पर आदित्य आदि जितने अधिकारी जीव थे, वे भी वरमसाक्षात्कार द…
- Verse 4उसके बाद का दृश्य कैसा था, यह कहते हैं / तदनन्तर सुन्दर विशाल तरंगों से युक्त महासागर की…
- Verse 5ब्रह्मलोकपर्यन्त वह सारा जगत्, केवल एकमात्र रससे परिपूर्ण पके हुए अंगूर के फल के सदृश, ज…
- Verse 6उन अनेक तरह के तरंग से तैरते हुए पर्वत समूहों तथा देवादिशरीरों से तोड़-फोड़ दिये जाने के…
- Verse 7इसी बीच में वहाँ मैने कोई एक भयंकर रूप देखा, जो आकाश से यानी ठीक आकाश के मध्य से अभ्युदित…
- Verse 8श्रय के कारणरूप अदृष्त विशेषणो से उसी रूपका वर्णन करते हैं / कल्पान्त जगत् के आकार के सम…
- Verses 9–16रंग में काला होते हुए भी कह अपने तेज से वमक रहा था; यह कहते हैं / लाखों तरुण आदित्यों के…
- Verses 17–18भाया कु ग्रकृतिं विद्याद् माधिना तु महेश्वरम्“ इत्यादि तियो मे महेश्वर नाम से प्रसिद्ध…
- Verse 19तथा समस्त प्राणियों को रुलाने एवं सभी शरणागत प्राणियों के रोगों को दूर भगाने में निमित्तभ…
- Verse 20वस्तुतः महाप्रकाशस्वरूप वह भगवान् चिदाकाश मात्र सार होने के कारण आकाशमात्र आकारवाला हे,…
- Verse 21उस अहंकार की सम्पूर्णं जीवों के प्रत्येक शरीर में बिलकुल अनुषक्त जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ…
- Verse 22वाक्, पाणि, पाद, गुदा, उपस्थ नामक जो पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं ये उसकी दाहिनी भुजाएँ है तथ…
- Verse 23तब इस तरह की मूर्ति से वह पहले क्यो न देखा गया, यदि यह आशंका हो, तो इसका उत्तर यह है कि व…
- Verse 24यदि वह एकमात्र आकाशस्वरूप ही हैं. तो फिर निराकार उसकी पूर्ववर्णित देहाक्रति क्यो ड्ृष्टिय…
- Verse 25चिदाकाशगत विशाल भूताकाश में तथा समस्त भूतों की देह में वायुके समान वह परमेश्वर नित्य स्थि…
- Verse 26उस प्रलयकाल में एक क्षणतक सबको क्षोभित करते हुए, सम्पूर्ण भूतो से परित्यक्त होकर चिदाकाशम…
- Verses 27–28सत्व, रज ओर तम-ये तीन गुणों के आकार, भूत, भविष्य ओर वर्तमान ये तीनों काल, चित्त, अहंकार ओ…
- Verse 29अब ˆकरिमात्मा“ इस द्वितीय प्रशन का उत्तर कहते हैं / चूँकि समस्त भूतसमूहों मे उस परमेश्वर…
- Verse 30{कि प्रयोजनः“ इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं / स्वरचित सम्पूर्ण जीवों को अपने-अपने कर्मों के…
- Verses 31–32भाव यह कि सर्वश्नत्तोपलम्धरूप स्वभाव ही उसका प्रयोजन है, और कुछ नहीं / चिन्यात्रआकाशरूप श…
- Verse 33(५) देखिये भगवान बादरायण का यह सूत्र : पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ।…
- Verse 34इसके अनन्तर श्वासवायु से आकृष्ट महासागर उनके विशाल मुख में, जिसका भीतरी भाग ज्वालामालाओं…
- Verse 35अन्य काल में भी जल सूख जाने पर तेज में ही उका उयसलार ग्रसिद्ध है इस आशय से कहते हैं / वही…
- Verses 36–37जैसे जल पाताल में, साँप बिल में और पंचपवन प्राणियों के मुखाकाश में प्रविष्ट होते है वैसे…
- Verse 38इसके बाद ब्रह्मलोक से लेकर पातालतक सब स्थान ऐसे शान्त और शून्य हो गया, जैसे धूल, धूम्र, व…
- Verse 39उस समय वहाँ आकाश के समान निर्मल तथा स्पन्दशून्य ये केवल चार पदार्थ ही दीख रहे थे । हे रघु…
- Verse 40उनके मध्य में एक तो काले रंग के आकाश के सदृश आकृतिवाले, निराकार भगवान् रुद्रदेव स्पन्दशू…
- Verse 41दूसरा सप्त पाताल के बहुत दूर पृथिवी ओर आकाशतल के सदृश ब्रह्माण्ड सदन का अधोभाग स्थित था
- Verse 42शैलेन्द्रं तथा देवताओं के सहित पाताल, भूतल तथा स्वर्गं बिलकुल भस्म हो जाने के कारण यानी त…
- Verse 43उनमें तीसरा पदार्थ ब्रह्माण्ड का ऊर्ध्वभाग स्थित था । बहुत दूर होने के कारण यहाँ तक आँखों…
- Verses 44–45चोथा पदार्थ तो उन दोनों के बीच में स्थित आकाश ही था, यह कहते हैं / बहुत दूर विभक्त हुए ब्…
- Verse 46श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, आवरणयुक्त उन ब्रह्माण्डखप्परों के बाहर क्या है ? उ…
- Verse 47इन चार ग्रश्नों में पहले बीच के दो प्रश्नो का उत्तर देते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : ह…
- Verse 48उसके बाद जल से दशगुना ज्वालात्मक तेज अवस्थित है । उसके अनन्तर जल के समान ही उस जल को पवित…
- Verse 49उसके बाद उस पवन के समान ही दशगुना विमल आकाश स्थित है । (प्रथम प्रश्न का उत्तर देते &// हे…
- Verse 50आकाश से परे उसे दशयुना अधिक अहंकारतत्व, उसने दशयुना अधिक महत्त्व और उसके आगे अनन्त प्रकृत…
- Verse 51अकशिष्ट चोथे प्रश्न का स्मरण दिलाते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं / हे मुनीश्वर, ब्रह्माण…
- Verse 52महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पार्थिव पदार्थो का जो भाग ब्रह्माण्डखमप्पर ह…
- Verse 53उम्र ब्रह्माण्डखप्पर के ऊपर स्थित जल के न गिरने में भी यही न्याय है, इस आशय से कहते हैं।…
- Verse 54जैसे शरीर में संयुक्त हाथ, पैर आदि अवयव अपनी अत्यन्त दृढ़संयोग स्थिति को नहीं छोड़ते वैसे…
- Verse 55ओर आवरणों के आधारथूत दोनों ब्रह्माण्डखप्परों का, जो भारी होने से अवश्य गिर जानेवाले हैं;…
- Verse 56यह जो आधारादि की चिन्ता हो रही है, सो स्रत्यतादृष्टि में ही हैँ / मिथ्याद्ृष्टि में तो जो…
- Verse 57इस मायिक जगत् का क्या पतन होगा अथवा इसमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसका कोई धारण करेगा ? यह…
- Verse 58जैसे आकाश में केशोण्ड्रक श्यामता है तथा जैसे आकाश में शून्यता है एवं पवन में जैसे रपन्दन…
- Verse 59हे श्रीरामचन्द्रजी, चिति में ब्रह्माण्डनामक संकल्पनगर है, उसके अन्दर अनेक जगत्रूपी घर हैं…
- Verse 60सम्पूर्ण पदार्थो का नियत या अनियत स्वभाव संवेदन के अनुसार ही प्रिद्ध होता है, यह कहते हैं…
- Verse 61स्थिति के अध्यास से युक्त संवित् से समुद्भूत यह संसार सदा अवस्थित है तथा उर्ध्वगमनमयी चि…
- Verse 62(कथं वा परिनश्यतः“ उत्का उत्तर देते हैं / महाकल्पादि के संकल्पो द्वारा नाशसंवित् से वह ब…
- Verse 63हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे शरत्कालीन आकाश की ओर देख रहे पुरुष की दृष्टि बेर के आकार के सदृश…