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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 17-18

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । किं स तादृग्विधो रुद्रः किं कृष्णः किं महाकृतिः । किं पञ्चवदनः कस्माद्दशबाहुः स तिष्ठति ॥ १७ ॥ किं त्रिनेत्रः किमुग्रात्मा किमेकः किंप्रयोजनः । केनेरितः किमकरोच्छायासीद्वद का मुने ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

भाया कु ग्रकृतिं विद्याद्‌ माधिना तु महेश्वरम्‌“ इत्यादि तियो मे महेश्वर नाम से प्रसिद्ध तो मायाशक्ल निराकार ब्रह्म ही है, फिर परमेश्वर किसलिए किन उपाधियों से पंचमुख आदि से विशिष्ट गुर्ति धारण करता है 2 अथवा स्रवत्मिक का परिच्छिन्न मूर्तिभाव केसे हो जाता है 2? यों विशेषरूप से जानने की इच्छा कर रहे श्रीरामचन्द्रणी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, सभी श्रुतियों में प्रसिद्ध वह परमेश्वर रुद्र उस तरह का भयानक स्वरूपवाला क्यों हैं ? अर्थात्‌ काले रंग का वह क्यों हैं उसकी महाभयानक विशाल आकृति क्‍यों है ? उसके पाँच मुख कौन हैं उसकी दस भुजाएँ कैसे हैं वह रहता कहाँ है ? उसकी तीन आँखे कौन हैं ? वह उग्र क्योँ है ? उसका स्वरूप क्या है ? सृष्टि आदि में उसका प्रयोजन क्या है ? वह स्वतंत्र है या परतंत्र ? यदि वह स्वतन्त्र है, तो पूर्णकाम उसकी संहार में प्रवृत्ति क्यों है यदि वह परतन्त्र है, तो फिर वह किससे प्रेरित होकर कार्य करता है ? उसने क्या किया ? उस परमेश्वर के रुद्ररूप होने पर उसकी इच्छारूप माया भी क्या थी ? यह सब कहिये