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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verses 27–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

ये गुणाकृतयः कालाश्चित्ताहंकारबुद्धयः । प्रणवस्य च ये वर्णा ये च वेदास्तथा त्रयः ॥ २७ ॥ रुद्रस्य तस्य ते नेत्रसंनिवेशेन संस्थिताः । त्रिशूलं तेन त्रैलोक्यं गृहीतं करकोटरे ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्व, रज ओर तम-ये तीन गुणों के आकार, भूत, भविष्य ओर वर्तमान ये तीनों काल, चित्त, अहंकार ओर बुद्धि, अ, उ, ओर म्‌ - ये तीनों प्रणव के अक्षर तथा ऋक्‌, यजु ओर साम-ये जो तीन वेद हैं वे ही उस रुद्र भगवान्‌ के तीनों नेत्ररूप से संस्थित हैं। अपने मुष्टिच्छिद्र मे उसने त्रिशूलरूपी तीनों लोक धारण कर रक्खं हैं