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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

वैरिञ्चनगरं दग्ध्वा ध्यानं कृत्वा विरञ्चिवत् । तेऽपि निर्वाणमाजग्मुर्निःस्नेहदशदीपवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

आरन्धवश अधिकार का अन्त हो जाने पर आदित्य आदि जितने अधिकारी जीव थे, वे भी वरमसाक्षात्कार द्वार अपने-अपने समस्त प्रयव का नाश हो जाने से एवोक्त के समान ही विदेहकेंवल्य को प्राप्त हो गये, यह कहते हैं / हे श्रीरामजी, विधाता के नगर को जलाकर तथा विधाता के समान ही स्वयं ध्यान करके वे आदित्य आदि भी निर्वाण को ऐसे प्राप्त हो गये, जैसे तेल और बत्ती से रहित दीप