Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verses 9–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verses 9–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 9-16
संस्कृत श्लोक
तरुणादित्यलक्षाणां तेज आभास्वरं दधत् ।
आदित्यत्रयसंकाशैः स्थिरविद्युच्चयोल्वणैः ॥ ९ ॥
नेत्रैराभास्वरमुखं ज्वालापुञ्जसमुद्गिरम् ।
पञ्चाननं दशभुजं त्रिनेत्रं शूलपाणिकम् ॥ १० ॥
आयान्तमन्तमुक्तेऽपि व्योम्नीव वितताकृतिम् ।
खमिवासि घनश्यामं देहमासाद्य संस्थितम् ॥ ११ ॥
स्थितमेकार्णवापूर्णाद्ब्रह्माण्डाद्वहिरम्बरे ।
व्योमेव हस्तपादादिसंनिवेशेन लक्षितम् ॥ १२ ॥
घोणानिलपरावृत्तिविधूतैकमहार्णवम् ।
गोविन्दमिव दोर्दण्डक्षोभितक्षीरसागरम् ॥ १३ ॥
कल्पार्णवजलापूरं पुंस्त्वेनेव समुत्थितम् ।
मूर्तियुक्तमहंकारमस्तकारणमागतम् ॥ १४ ॥
कुलाचलबृहद्वृन्दमिवोड्डयनडम्बरैः ।
पक्षौघैरुत्थितं व्योम समस्तमभिपूरयत् ॥ १५ ॥
ततस्त्रिशूलनयनैर्मया रुद्रोऽयमित्यसौ ।
दूरादेव परिज्ञाय परमेशो नमस्कृतः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
रंग में काला होते हुए भी कह अपने तेज से वमक रहा था; यह कहते हैं /
लाखों तरुण आदित्यों के प्रकाशमय तेज को वह धारण कर रहा था । देदीप्यमान स्थिर
बिजली के समूह-जैसे तीन सूर्यो के सदृश नेत्रों से युक्त उसका मुख तो बहुत ही ज्यादा चमकदार
दीखता था। वह ज्वालाओं के पुंज को खूब उगल रहा था । उसके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं और
तीन उसके नेत्र थे । वह अपने हाथ में त्रिशूल लिये हुए था, अन्तशून्य आकाश में वह मानों आ रहा
था, उसका आकाश की तरह विशाल आकार था, दीप्त मेघ की तरह श्याम शरीर धारण कर वह
स्थित था । एकमात्र महासागर के परिपूर्ण ब्रह्माण्ड के बाहर आकाश में वह अवस्थित था, हाथ,
पैर आदि के रचनाविशेषों से लक्षित वह आकाश-जैसा था । अपनी नाक की श्वासवायु के
गमनागमन से वह उस एक महासागर को कम्पित कर रहा था । वह अपने भुजदण्डों से क्षीरसागर
को क्षुभित कर देनेवाले गोविन्द भगवान् के सदृश था । उसे देखने से ऐसा मालूम हो रहा था कि
महाप्रलयकालीन सभी समुद्रों की बाढ़ ही मानों पुरुषाकार से स्वयं उपस्थित हो गयी है, तथा
सबका कारण होने से स्वयं कारणरहित सर्वसमष्टिरूप अहंकार ही मूर्तिमान् होकर आ गया हो ।
प्रतीत हो रहा था कि मानों उड़ने में अत्यन्त कुशल अपने पंखसमूहों से समस्त कुलपर्वतों के
महावृन्द ने ही स्वयं अपने स्थान से उड़कर सारे आकाश को पूर्ण कर दिया है । वैसा रूप देखने
के अनन्तर त्रिशूल तथा तीन नेत्रं से "यह भगवान् जगदीश्वर रुद्र हैं” ऐसा मैंने दूर से ही उस
भगवान् परमेश्वर को नमस्कार किया