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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

अनन्तरं मया दृष्टस्तत्रासौ यावदुद्यमात् । प्रवृत्तः प्राणवेगेन तमाक्रष्टुं महार्णवम् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

(५) देखिये भगवान बादरायण का यह सूत्र : पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ । (३.२.१.५) (&) देखिये गौड पादाचार्य ने क्या कहा है : “देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा" । किमकरोत्‌ इस उपान्त्य प्रश्न का उत्तर छुनने के उत्सुक श्रीरामचन्द्रकी को जानकर महाराज वस्तिष्ठजी उत्तर देते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, वैसा भयंकर रूप देखने के बाद मैंने देखा कि वहाँ यह परमेश्वर उद्यम करके यानी उद्यत होकर श्वासवायु के वेगसे उस महासागर को पी जाने में प्रवृत्त हो गये