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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 44,45

संस्कृत श्लोक

दूरविश्लिष्टयोर्मध्यं यत्तद्ब्रह्माण्डखण्डयोः । तदाकाशमनाद्यन्तं ब्रह्म निर्मलमाततम् ॥ ४४ ॥ चतुर्थोऽसौ पदार्थस्तु तदा संलक्षितो मया । चतुष्टयादत्र नान्यदेतस्मादेव किंचन ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

चोथा पदार्थ तो उन दोनों के बीच में स्थित आकाश ही था, यह कहते हैं / बहुत दूर विभक्त हुए ब्रह्माण्ड के उन दोनों खण्डों के बीच में जो स्थित था वह तो एकमात्र आदि-अन्तशून्य सर्वत्र व्याप्त निर्मल ब्रह्माकाश ही था । हे श्रीरामचन्द्रजी, वही उसमें चौथा पदार्थ था, जिसका मैंने उस समय अवलोकन किया । मेरी आँखों के सामने उपस्थित इन चार पदार्थो के बीच में इन चारों से अतिरिक्त और कोई दूसरा वहाँ नहीं था, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है