Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
किमस्य नाम पतति किंवा केनास्य धार्यते ।
यथा संवित्ति कचनं तथैतदवतिष्ठते ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस मायिक जगत् का
क्या पतन होगा अथवा इसमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसका कोई धारण करेगा ? यह ठीक वैसा
ही अवस्थित है जैसा कि संवित् का स्फुरण है अर्थात् चितिशक्ति के स्फुरण के अनुसार यह
अवभासित हो रहा है