Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 64
तिरसठवाँ सर्ग समाप्त चौसठवाँ सर्ग वसिष्ठजी के प्रश्न करने पर विद्याधरी द्वारा विस्तार के साथ वैराग्यपर्यन्त अपने घर मेँ जन्म आदि का निरूपण ।
68 verse-groups
- Verse 1आसंगिक विषय का निरूपण कर अब महाराज वस्निष्ठजी प्रस्तुत कथा का अवशिष्ट भाग कहते हैं / महार…
- Verse 2कमल के गर्भ के सदृश कोमल तथा सुन्दर रूपवाली हे ललने, तुम कौन हो, मेरे पास क्यों आई हो, तु…
- Verse 3विद्याधरी ने कहा : हे मुने, आप सुनिये, मैं अपना वृत्तान्त जैसा है, वैसा आपसे कहती हूँ । य…
- Verse 4पहले अपने घर को बतलाने के लिए उपक्रम करती ह / महाराज प्रकाशरूप चिदाकाश के कोश के किसी एक…
- Verse 5इस आपके जगद्रूपी घर के अन्दर पाताल, भूतल और स्वर्ग- ये तीन घर के अन्दर के प्रकोष्ठ हैं, इ…
- Verse 6उन तीनों में जो भूतल है, वह कंकणों के सदृश द्वीपो ओर समुद्रं से वलित है यानी चारों ओर से…
- Verse 7साता द्वीप ओर समुद्रो के अन्त में चारों ओर से दस हजार योजन तक लम्बी, चौड़ी सुवर्णमयी पृथ्…
- Verse 8उसरी पृथ्वी का वर्णन करते हैं / महाराज यह पृथ्वी बड़ी ही विचित्र है यह रात में भी स्वयं प…
- Verse 9यह अप्सराओं को साथ लिये हुए देवताओं एवं सिद्धों की लीलाविहार भूमि है । ज्यों हि केवल संकल…
- Verse 10उस मही के अन्त में (बाहरी प्रान्त में एक लोकालोक नामका अत्यन्त विख्यात पर्वत है । जगत् ल…
- Verse 11अब उस पर्वत का वर्णन करती हैं / भगवन्, यह पर्वत कहीं पर तो मूढ़मति पुरुषों के अन्तःकरण क…
- Verse 12जैसे सज्जनो की संगति आह्वाद को पैदा करती है, वैसे ही यह कहीं पर अत्यन्त ही आह्वाद को पैदा…
- Verse 13बुद्धिमान पुरुषों के मन में जैसे सभी अर्थ विस्पष्ट रहते हैं, वैसे ही इसमें कहींपर तो सभी…
- Verse 14कहीं पर तो इसमें चन्द्रमा की किरणे ही जाने नहीं पाती, कहीं पर सूर्य की ही किरणें नहीं जान…
- Verse 15कहीं पर तो देवताओं के नगर के नगर हैं, कहीं पर दैत्यों के बड़े-बड़े नगर विद्यमान हैं, कहीं…
- Verse 16कहीं पर तो उसके गङ्ढों मे गीध घूम रहे हैं, कहींपर तो समान भूभाग के कारण बड़ा ही लुभावना ल…
- Verse 17कहीं पर तो उसमें जनों से शून्य बड़े-बड़े जंगल हैं, कहीं पर कल्पान्त की वायु बह रही है, कह…
- Verse 18कहीं पर पाताल के सदृश अत्यन्त गहरी गुफाओं में कुम्भाण्ड पिशाचों का वास होने के कारण बड़ा…
- Verse 19कहीं पर निरन्तर ही स्थित रहने वाले मतवालों की नाई गर्जन में निरत मेघमण्डल हैं, तो कहीं पर…
- Verse 20कहीं पर जनपद के विक्षुब्ध हो जाने के कारण विचलित हुए मनुष्यो आदि के प्रहारो से राक्षस-पिश…
- Verse 21कहीं पर तो निरन्तर बह रही वायुओं के द्वारा ही स्थावर ओर जंगम भूत उत्पन्न ही नहीं हुए हैं,…
- Verse 22कहीं पर मरुस्थली के बड़े-बड़े झंझावातों के द्वारा उत्पन्न इंकारध्वनि से महान् भयंकर लगता…
- Verse 23कहीं पर जलो का सुन्दर विलास है, कहीं पर मेघो के गर्जन से घर्घरध्वनि युक्त है और कहीं पर प…
- Verse 24कहीं पर उसके दिशातट पिशाचो एवं कुम्भाण्डो से वेष्टित होने के कारण स्तब्ध हैं और कहीं पर त…
- Verse 25कहीं पर बरस रहे मेघो की नदीरूप बाहुओं से उसका कुछ तटभाग तोड़ दिये जाने के कारण भयावह लगता…
- Verse 26कहीं पर अपने कोशरूपी मुखपर स्थित भ्रमरभूत नेत्रो से ध्यान कर रही कमलिनियों का समूह भरा पड…
- Verse 27कहीं पर तप रहे सूर्य और जनता के आचरण से सुन्दर है तो कहीं पर रात के अन्धकाररूप घर में मत्…
- Verse 28कहीं पर उत्पन्न हो रहे बड़े-बड़े उत्पातां के कारण उसकी भूमि मनुष्यों के विनाश से भयप्रद ह…
- Verse 29कहीं पर अत्यन्त शून्य ही है, कहीं पर जनपदों से आक्रान्त हैं । कहीं पर जलपूर्णं महाद्वन्द्…
- Verse 30कहीं पर उसमें बड़े-बड़े कल्पतरु वृक्ष हैं, कहीं पर वह जलरहित हैं, कहींपर चलने-फिरनेवाले प…
- Verse 31कहीं पर तो प्राणियों से शून्य होकर ही व्यर्थ का उन्नत बना है, कहीं पर लम्बी मरुभूमि ही पड…
- Verse 32कहीं पर उसमें आकाश के सदृश निर्मल और विस्तृत बड़े-बड़े सरोवर हैं । कहीं पर महामरुस्थल हैं…
- Verse 33अधिक क्या कहूँ, महाराज, उसके शिखरो पर ऐसी रत्नमयी बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जो कि छोटे-छोटे प…
- Verse 34हे मुने, क्षीरसागर और सूर्य के सदृश गौरवर्ण उन शिखरस्थ शिलाओं के ऊपर पुत्र, पौत्र आदि परि…
- Verse 35भगवन्, उन शिलाओं के मध्य में उस पर्वत के उत्तर दिशा के भाग में पूर्व दिशा की ओर स्थित शि…
- Verse 36हे मुने, हमको नियति ने ही बाँध दिया है, जिससे कि मैं उस पत्थर के यन्त्र में बस रही हू । म…
- Verse 37अब किसकी रक्री हो' इत्यादि प्रश्नो का उत्तर देने के लिए उपक्रम करती हैं / न केवल मैं ही ऐ…
- Verse 38उस शिला के कोटर के संकट में फँसकर मैंने उस अपने पति के साथ दीर्घकाल तक अनुभव किया और अनेक…
- Verse 39आज भी हम दोनों अपने एकमात्र कामरूप दोष से मोक्ष प्राप्त नहीं कर रहे हैं और उसी तरह एक दुस…
- Verse 40महाराज, उस पाषाण के संकट में हम दोनों ही बद्ध नहीं हैं, किन्तु हम लोगों का पुत्र, पौत्र,…
- Verse 41भगवन्, उसमें बंधा हुआ मेरा पति द्विजकुलोत्पन्न और बड़ा ही प्राचीन पुरुष है । वह यद्यपि स…
- Verse 42मेरे पति बाल्यकाल से ही ब्रह्मचारी हैं, अपने वेदाध्ययन में परायण रहते हैं, अन्य को पढ़ाते…
- Verse 43हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ, ऐसे पुरुष की मैं पत्नी बड़ी ही व्यसनिनी हूँ, एक क्षणमात्र भी…
- Verse 44ब्रह्मन्, आप सुनिये-उन्होंने मुझको भायरिप में कैसे प्राप्त किया और हम लोगों का यह स्वाभा…
- Verses 45–48भगवन्, पहले की बात है जिस समय उत्पन्न हुए मेरे स्वामी की अभी बाल्यावस्था ही थी, कुछ ज्ञा…
- Verse 49अनन्तर, अपने पति के द्वारा मन से निर्मित अतएव मानसी भार्या में मन्दारवृक्ष की लता के समान…
- Verse 50फूलों के मुकुलों के सदृश उन्नत स्तनोवाली मैं समग्र गुणों से धीरे-धीरे ऐसे सुशोभित होने लग…
- Verse 51मैं सदा ही सभी तरह के जन्तुओं के हृदयो का अपहरण करनेवाली हो गई, हिरन के जैसे बड़े-बड़े ने…
- Verse 52मैं निरन्तर केवल लीलाविलासों में ही निरत रहने लगी, कौतुकसे तिरछे कटाक्ष मेरे होने लगे, मै…
- Verse 53मैं अपने उत्तम भाग्य को ही मुख्य भोग समझने लगी, समदर्शी अपने पति के मन से उत्पादित (मन की…
- Verse 54प्रिय मुने, मैं केवल अपने ब्राह्मण पति के घर को ही धारण नहीं करती , परन्तु पति के मनोमयरू…
- Verse 55मुनिवर, मँ पुत्र, पौत्र आदि से कुलको बढ़ाने वाली भार्या हूँ, मे पोष्यवर्ग का पालन करती हू…
- Verse 56तदनन्तर मे पूर्ण युवती हो गई, मेरे वक्षःस्थलपर महान् उन्नत स्तन हो आये । अब मेँ अपने विल…
- Verse 57मेरे पतिदेव तो दीर्घसूत्री (आलसी), स्वाध्याय में निरत और बड़े तपस्वी हैं, किसी अज्ञात अपे…
- Verse 58महाराज, मैं अधिक क्या कहूँ, पति के साथ मैं यौवन से प्राप्त हुए भोगविलास की इच्छा रखती हूँ…
- Verse 59मैं शीतपवन के कारण चंचल हुई कमलिनियों मे भी रात-दिन ऐसे अंगदाह का अनुभव करती हूँ, जैसे कि…
- Verse 60कुसुमं की वृष्टियों से पूर्ण समस्त उद्यानभूमि भी मुझे तपी हुई बालू से युक्त शून्य मरुभूमि…
- Verse 61महाराज, जलकल्लोल, कह्लार ओर कमलों के ढेर से कोमल स्पर्शयुक्त एवं सारसपक्षियों की मधुर ध्व…
- Verse 62मेरे शरीर के दाह की शान्ति के लिए सखियाँ मुझे पुष्कर, मन्दार, कुई आदि फूलों की शय्यापर सु…
- Verse 63कुई, नीलरक्त, कहूलार, कदली आदि की शब्याएँ मेरे अंग के स्पर्शमात्र से जनित ताप से - गर्मी…
- Verse 64ब्रह्मन्, जो पदार्थ सुन्दर, उचित, स्वादु, विचित्र ओर मनोहर है, उन्हे देखकर मैं अपने भीतर…
- Verse 65मुनिवर, कामरूपी अग्नि से सन्तप्त, मेरे नयनाश्रु छम-छम शब्दपूर्वक कमलोत्पलों की पंक्तियों…
- Verse 66॥ उद्यानभागों में सखियों द्वारा कदली, कन्दली आदि के कन्धोपर विरचित हिंड़ोंलों पर दोलनलीला…
- Verse 67हिमकणों के निकर से संकीर्णं केले के पत्तों से बनाये गये मण्डप को मैं गर्मी उगलने वाले खैर…
- Verse 68कमलिनि के नालरूप हिंडोले पर जब मैं सारस के साथ सारसी को देखती हूँ, तब मेँ दीनवदन होकर अपन…
- Verse 69मैं रम्य पदार्थ में रोती हूँ, मध्यवर्ती (न रम्य ओर न अरम्य ऐसे बीच के) पदार्थ में सौम्य ह…
- Verse 70हे मुने, प्रत्येक दिशा में कुन्द, मन्दार, कुमुद ओर हिम मैंने कामाग्नि से दग्ध हुए जीवों क…
- Verse 71भगवन्, अत्यन्त नीलवर्णं तमाल के कोमल पल्लव, बिसतन्तुओं की लता, नील-रक्त कमल, कलार, कुन्द…