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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

सौभाग्यभोगपरमा लक्ष्म्यलक्ष्म्योः प्रिया सखी । अनन्या मोहजालानामखिन्ना संपदापदोः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं अपने उत्तम भाग्य को ही मुख्य भोग समझने लगी, समदर्शी अपने पति के मन से उत्पादित (मन की कल्पनारूप) मैं लक्ष्मी, अलक्ष्मी-दोनों की मानों प्रिय सखी बन गई यानी मैं भी सम्पत्ति ओर विपत्ति में एकरूप रहती हूँ