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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

स्वयंप्रकाशसंकल्पफलदाम्बरनिर्मला । चिन्तामणिमयी स्वच्छा स्वच्छायाजितविष्टपा ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसरी पृथ्वी का वर्णन करते हैं / महाराज यह पृथ्वी बड़ी ही विचित्र है यह रात में भी स्वयं प्रकाशती रहती है यानी इसमें रात को भी प्रकाश के लिए किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं होती, इसमें सभी तरह की इच्छाएँ सफल हो जाती है, आकाश के सदृश यह निर्मल है, इसमें चिन्तामणियों की अधिकता काफी है, धूलि का तो इसमें नामनिशान नहीं है, अपनी अपूर्वं छटा से इसने स्वर्गादि लोकों को भी तुच्छ बना दिया है