Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 64, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
क्वचित्क्षुब्धजनाक्षेपसमुत्सादितभूतभूः ।
क्वचिद्वास्तव्यजनतासौजन्यजितविष्टपः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर जनपद के विक्षुब्ध हो
जाने के कारण विचलित हुए मनुष्यो आदि के प्रहारो से राक्षस-पिशाच आदि का निवास (पिप्पल
आदि) उच्छिन्न हो गया है और कहीं पर रहनेवाले मनुष्यों की सज्जनता के कारण उसने स्वर्ग पर
भी विजय पा ली है