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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 47

छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग विस्तार से प्रस्तुत मुक्ति का साधनों के क्रम में दृढ़ वैराग्य की प्राप्ति तक के जितने साधन हैं, उन सबका पुनः वर्णन।

51 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, जो जीव इस संसार के भार को ढोते-ढोते थक गया है तथ…
  2. Verses 2–3सवसो पहले विवेकरूफी अंकुर का उदय होने पर जिन गुर्णो की ग्राप्त होती हैं, उन्हें बतलाते है…
  3. Verse 4ऐसा होने पर पहले अज्ञानियों के संसर्ग का त्याग, यज्ञ-दान आदि में तत्परता तथा देवता की आरा…
  4. Verse 5जिस तरह चन्द्रमा का बिम्ब लोगों को आनन्द देनेवाला अमृत धारण करता है, उसी तरह तत्त्ववेत्ता…
  5. Verse 6एेसा तत्त्ववेत्ता अपने पक्ष में अनुराग रखता है ओर न लोभ या अभिमान ही रखता है, सदा पर के ह…
  6. Verse 7ऐसे महापुरुष की पहली संगति ही पुरुष को सुख पहुँचाती है, उसकी संगति मक्खन के आश्रय दही के…
  7. Verse 8विवेकी पुरुषों के चन्द्रमा की किरणों के सदृश चरित्र अत्यन्त पवित्र और शीतल रहते हैं, इसलि…
  8. Verse 9जैसी साधु पुरुष के समागम से निर्भय शान्ति मिलती है, वैसी शान्ति मनोहर पुष्पों के ढेरों से…
  9. Verse 10जैसे भगवती भागीरथी के निर्मल जल पाप धो डालते हैं ओर शुद्धता प्रदान करते हैं, वैसे ही विवे…
  10. Verse 11संसार पार पाने की इच्छा रखनेवाले विरक्त विवेकी पुरुषों का समागम होने पर पुरुष ऐसी शीतलता…
  11. Verse 12भद्र, जैसी उदार प्रीति विवेकी पुरुष में रहती है, वैसी उदार प्रीति देवता, गन्धर्वं और मानव…
  12. Verse 13क्रम से किये गये उचित निष्काम कर्म से बुद्धि का मल हट जाता है, बुद्धि का मल हट जाने पर आत…
  13. Verse 14विवेक से पूर्ण हृदय में शास्त्रार्थरस से पूर्ण होकर उत्तम प्रज्ञा ऐसे बढ़ने लग जाती है, ज…
  14. Verse 15दर्पण के सदृश, निर्मलता से शोभित बुद्धि अपने भीतर प्रतिबिम्बित समस्त वस्तुओं का अपने अन्द…
  15. Verse 16साधुओं के समागम से शुद्धवुद्धि हुआ तथा शास्त्र के अर्थो से परिमार्जित हुआ प्राज्ञ (विवेकी…
  16. Verse 17विवेकी पुरुष चमकीले सुवर्ण के सदुश चमक रहे तथा निर्मल प्रकाश करनेवाले अपने आत्मप्रकाश से…
  17. Verse 18विवेकसम्पन्न तत्त्वज्ञ पुरुष अभ्यास द्वारा शास्त्र का ओर सेवा आदिवृत्ति से गुरुसमागम का व…
  18. Verse 19क्रमशः राग आदि दोषों का विनाश एवं मेत्री आदि गुणों का संचय कर वह निर्दोष ओर गुणवान्‌ बनकर…
  19. Verse 20भद्र, व्यसनी बनकर विषयों के प्रति दौडना बड़ा भारी दुर्भाग्य है, इस दुर्भाग्य का दिन पर दि…
  20. Verse 21इस विवेकी के मुख में भोगलम्पटता से निर्मुक्त कोई अनिर्वचनीय अपूर्व ही कान्ति एेसे जगमगाने…
  21. Verse 22जिन लोगों ने तीनों जगत्‌ को भी तृणरूप समझ लिया है, उन महान्‌ आत्माओं द्वारा यह ऐसे प्रशंस…
  22. Verse 23भद्र, विवेकी को जो कुछ भोगसाधन प्राप्त होते हैं, उनका परित्याग कर वह सन्तुष्ट तो होता है,…
  23. Verse 24यदि अधम चाण्डाल आदि को दैववशात्‌ अपनी पूर्वजन्म की उच्च जाति का स्मरण हो गया, तो वह अपनी…
  24. Verse 25इस तरह के पुरुष को एक तरह से पृथ्वी में उदय को प्राप्त चन्द्रमा ही समझना चाहिए, इसे देखने…
  25. Verse 26सदा ही भोगों के प्रति वह आदर नहीं रखता, इसीलिए उन सिद्ध महात्माओं के द्वारा अत्यन्त प्रसन…
  26. Verse 27उन भोगों के प्रति उसे जो अधिक आदर नहीं होता, इसमें कारण यह है कि गुरु और शास्त्र के समागम…
  27. Verse 28अनन्तर जैसे स्वास्थ्य चाहनेवाला पुरुष वैद्य की शरण लेता है, वैसे ही अपने भावी अधिक कल्याण…
  28. Verse 29सज्जनं के समागम से उसकी बुद्धि बड़ी उदार हो जाती है, उदारवुद्धि होकर वह उपनिषद्‌ के महावा…
  29. Verse 30क्योकि सज्जन का यह स्वभाव है कि वह अपने पास स्थित प्राणी को बड़ी-बड़ी आपत्तियों से उवार क…
  30. Verse 31जो विवेकी है उसकी बुद्धि पहले से ही दूसरे का धन लेने से विरत बनी रहती है और अपने ही अर्थो…
  31. Verse 32दूसरे के धनग्रहण से विरत तथा सन्तोषरूपी अमृत से निर्भर विवेकी पुरुष क्रम से उत्तरोत्तर अप…
  32. Verse 33उसके पास जो कोई याचक आ जाय, उसे कण, पिण्याक (तिल या सरसों की खली), शाक आदि जो कुछ भी हो द…
  33. Verse 34विवेक के अनुसरण से जिनका चित्त लीन हो गया है उनका दिन पर दिन ज्ञान बढ़ता ही जाता है ओर अज…
  34. Verse 35विवेकी को सबसे पहले प्रयत्नपूर्वक दूसरे का धन लेने से निवृत्त हो जाना चाहिए और इसका भली प…
  35. Verse 36इसके बाद भोगनिवृत्ति के साथ-साथ अपने स्वार्थो को भी क्रमशः तिलांजलि दे देनी चाहिए, क्योंक…
  36. Verse 37श्रीरामजी, यह बात आप निश्चित मानिये कि जीवनपर्यन्त जैसा अर्थोपार्जन के लिए झेला गया दण्डर…
  37. Verse 38जो मूढ पुरुष हैं; उनको पारलोकिक दुःखो का स्मरण भले ही न हो, पर ऐहिक दुःखों का तो उन्हें स…
  38. Verse 39भद्र, यदि विवेक से विचारा जाय, तो ये अर्थ बड़े भारी अनर्थरूप, सम्पत्तियाँ महान्‌ विपत्तिर…
  39. Verse 40जब तक पुरुष निन्दनीय ऐहिक या पारलौकिक अर्थों के लिए महान दुःख रूप अनर्थ झेलने की इच्छा नह…
  40. Verse 41जिस पुरुष को मोक्ष का सुख ही सदा के लिए सबसे बढ़-चढ़कर जँचता हो, वह पुरुष धन को यह समझे क…
  41. Verse 42धन में तुच्छता ढ़ करने के लिए बार-बार उम्नकी निन्दा करते हैं / भद्र, यह जो धन है, उसको मु…
  42. Verse 43सन्तोष ही वैराग्य में बैठाकर पुरुष को सब दुःखो से छुटकारा दिलाता हैं, इसलिए अब सन्तोष की…
  43. Verse 44सभी प्रकार के सुखो का कारण भी वही है, यह कहते हैं / सुख के साधन एक ओर तो वसन्त, नन्दनवन,…
  44. Verses 45–46जैसे सरोवर अपने भीतर की परिपूर्णता वृष्टि से कर सकता है, वैसे ही पुरुष भी अपने भीतर परिपू…
  45. Verse 47जो पुरुष सन्तोष धारण नहीं करता ओर अर्थो के लिए लालायित रहता है, उसकी प्रकृति ठीक उस कीट क…
  46. Verse 48धन के लोभी जीवों की आकृतियाँ (आकार) विकृत ही रहा करती है ओर वे अपनी स्वस्थ स्थिति ऐसे प्र…
  47. Verse 49अर्थसम्पत्ति और प्रमदा-ये दोनों वस्तुएँ तरगों के सदृश थोड़ी ही देर में नष्ट हो जानेवाली ह…
  48. Verse 50धन के उपार्जन ओर रक्षण में जो भारी यातनाएँ होती हैं, उनको जानकर भी जो धन की इच्छा करता है…
  49. Verse 51जो पुरुष सन्तोषरूपी हँसिये से एक साथ बाहर की इन्द्रियों के बरताव को और भीतर के संकल्प आदि…
  50. Verse 52दढ वैराग्य की प्राप्ति तक के जितने गुण अभी-अभी पीछे बतलाये गये हैं वे भलीभाँति अभ्यस्त हो…
  51. Verse 53पुरुष को सबसे पहले संसार में विरागदशा प्राप्त करनी चाहिए, फिर सत्समागम ओर शास्त्रों का अभ…