Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
अनुत्तमसुखं यस्मै चिराय परिरोचते ।
जगत्तृणशिखादृष्ट्या सोऽर्थं पश्यतु शाम्यतु ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पुरुष को मोक्ष का सुख ही सदा के लिए सबसे बढ़-चढ़कर जँचता हो, वह पुरुष धन को यह
समझे कि वह जगत्-रूपी तिनके के अग्रिम हिस्से के सदृश अत्यन्त तुच्छ है ओर यह समझकर
उससे शान्ति ग्रहण करे यानी उसे प्राप्त करने के लिए अनर्थ के फन्दे में न फँसे