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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

जगत्त्वमज्ञसंबुद्धं ज्ञो विदन्नसदेव यत् । सतीव तत्र स्फुरति तदनभ्यासजृम्भितम् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

दढ वैराग्य की प्राप्ति तक के जितने गुण अभी-अभी पीछे बतलाये गये हैं वे भलीभाँति अभ्यस्त होने पर ही ज्ञान की स्थिति बना देते हैं; ऊपर-ऊपर से अभ्यस्त होने पर नहीं; इस आशय को लेकर उपसहार की इच्छा से कहते हैं । भद्र, अज्ञानियों से सम्बन्ध रखनेवाली जगत्‌ की जो विचित्रता है, वह साक्षी आत्मा में सत्यता रखती ही नहीं, यों जान रहा भी ज्ञानी जगत्‌ में सत्य अर्थ समझनेवाले अज्ञ के सदृश जो अपरिपक्व ज्ञान के कारण व्यवहार करता है, वह प्रस्तुत वैराग्यादि के अनभ्यास का ही परिणाम है