Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
क्रमात्सज्जनतामेत्य शास्त्रार्थभरभावितः ।
भाति भोगानधःकुर्वन्पञ्जरादिव निर्गतः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
क्रमशः राग
आदि दोषों का विनाश एवं मेत्री आदि गुणों का संचय कर वह निर्दोष ओर गुणवान् बनकर शास्त्र में,
उपनिषद् में कहे गये अर्थो की भावना से पूर्ण भावुक बन जाता है । फिर पिजड़ से छुटकारा पाये
हुए के सदृश स्वतन्त्र होकर तथा भोगों का तिरस्कार कर प्रकाशने लग जाता है