Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
परस्वादानविरतः संतोषामृतनिर्भरः ।
विवेकी क्रमशः स्वार्थानप्युपेक्षितुमिच्छति ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरे के धनग्रहण से विरत तथा सन्तोषरूपी अमृत से निर्भर विवेकी पुरुष क्रम से
उत्तरोत्तर अपने स्वार्थो की भी उपेक्षा करने की इच्छा करता है, ऐसी स्थिति में वह दूसरे का धन
तो चाहेगा ही कैसे ?