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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verses 45–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 45,46

संस्कृत श्लोक

सरसः प्रावृषेवान्तः संतोषेणैव पूर्णता । गम्भीरां शीतलां हृद्यां प्रसन्नां रसशालिनीम् ॥ ४५ ॥ साधुरोजस्वितामेत्य संतोषेणैव राजते । सुपुष्पितवनाकारो वसन्तेनेव पादपः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे सरोवर अपने भीतर की परिपूर्णता वृष्टि से कर सकता है, वैसे ही पुरुष भी अपने भीतर परिपूर्णता सन्तोषसे ही कर सकता है। सज्जन पुरुष गम्भीर, शीतल, मनोहर, प्रसन्न और रसपूर्ण ओजस्विता को सन्तोष के ही द्वारा प्राप्त कर सुन्दर पुष्पों से युक्त वन के सदृश होकर ऐसे शोभित होने लगता है, जैसे वसन्त से वृक्ष