Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
भोगाभिगमदौर्भाग्यं दिनानुदिनमुज्झता ।
तेन तत्कुलमाभाति ताराचक्रमिवेन्दुना ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
व्यसनी बनकर विषयों के प्रति दौडना बड़ा भारी दुर्भाग्य है, इस दुर्भाग्य का दिन पर दिन त्याग कर
रहे उस विवेकशील पुरुष के द्वारा उसका वंश उस तरह चमकने लग जाता है, जिस तरह चन्द्रमा
के द्वारा तारों का समूह चमकने लग जाता है