Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
भोगानां द्वेषणेनान्तर्लज्जमानो मनस्यपि ।
भोगानामप्यसंपत्त्या परमं परितुष्यति ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, विवेकी को जो कुछ भोगसाधन प्राप्त होते हैं, उनका
परित्याग कर वह सन्तुष्ट तो होता है, परन्तु कुछ लज्जाग्रस्त बना रहता है, क्योकि उसके मन में
इस बात की शर्म रहती है कि मैंने सभी से जब द्वेष छोड दिया तब भोगों के प्रति द्वेष क्यों कर रहा
हूँ और यदि भोगसाधन विषय उसे प्राप्त ही नहीं हुए, तो वह अत्यन्त सन्तुष्ट रहता है, क्योकि इस
अवस्था में उसे द्वेष करने का मौका ही नहीं मिलता