Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
परप्रज्ञानुगो भव्यः परार्थपरिपूरकः ।
पवित्रकर्मरसिकः कोऽपि सौम्यः प्रवर्तते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
एेसा तत्त्ववेत्ता अपने पक्ष में अनुराग रखता है ओर न लोभ
या अभिमान ही रखता है, सदा पर के हित में निरत रहता है, इसीसे परप्रज्ञानुग कहा जाता है । वह
सभी जनों का प्रिय होता है, पवित्र शास्त्रानुकूल कर्मो मे रसिक बना रहता है तथा इन गुणों के
कारण सबसे ऊँचा होकर वह विचरण करता रहता है