Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
पूर्वं संसृतिवैरस्यमन्तरेवोदितात्मनः ।
जायते जीर्णजाड्यस्य पाकादिव शरत्तरोः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उन भोगों के प्रति उसे जो अधिक आदर नहीं
होता, इसमें कारण यह है कि गुरु और शास्त्र के समागम से भोगों के प्रति पहले से ही उसके मन
में नीरसता पैदा हो जाती है तथा उसकी जडता भी जीर्ण-शीर्णं ऐसे हो जाती है, जैसे शरद् ऋतु
का पौधा पाक से जीर्ण-शीर्ण हो जाता है