Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
नूनं विलयचित्तानां विवेकमनुधावताम् ।
मौर्ख्यं लघुत्वमायाति धावतामिव गोष्पदम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेक के अनुसरण से जिनका चित्त लीन हो गया है उनका दिन पर दिन ज्ञान बढ़ता ही जाता
है ओर अज्ञान क्षीण होता जाता है यह कहते हैं ।
विवेक के पीछे-पीछे दौड़ रहे तथा चित्त की विलयदशा को प्राप्त हुए पुरुषों का अज्ञान
ऐसे तुच्छ हो जाता है, जैसे दौड़ रहे घोड़ों के लिए बड़ा भारी गड्ढा भी गोपद की नाई तुच्छ
यानी अनायास उल्लंघन योग्य हो जाता है