Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
स्वा एवोपहसत्यन्तस्तरुणीस्तरलक्रियाः ।
खेदस्मेरमुखो जातीर्जातिस्मर इवाधमः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अधम चाण्डाल आदि को
दैववशात् अपनी पूर्वजन्म की उच्च जाति का स्मरण हो गया, तो वह अपनी इस जन्म की जाति
को जैसे मन में धिक्कारता है, वैसे ही विवेकी पुरुष भी पहले की राग आदि से प्रौढ तथा भोग की
उत्कण्ठा से तरल हुई अपनी क्रियाओं का स्मरण कर खेद से कुछ हंसमुख होकर अपने भीतर
उनको धिक्कारता है