Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
भूरिभावविकाराणां जरामरणकर्मणाम् ।
दैन्यदौरात्म्यदाहानामर्थः सार्थ इति स्मृतः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
धन में तुच्छता ढ़ करने के लिए बार-बार उम्नकी निन्दा करते हैं /
भद्र, यह जो धन है, उसको मुनियों ने यह कहकर याद किया है कि वह चिन्ता, शोक आदि
भावविकारो का, जरा, मरण के जनक दुष्ट कर्मो का तथा दीनता, दुष्टता, जलन आदि का ढेर है