Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
सज्जनो हि समुत्तार्य विपद्भ्यो निकटस्थितम् ।
नियोजयति संपत्सु स्वालोकेष्विव भास्करः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
क्योकि सज्जन का यह स्वभाव है कि वह अपने पास स्थित प्राणी को
बड़ी-बड़ी आपत्तियों से उवार कर सम्पत्तियां में ऐसे सम्बन्ध करा देता है, जैसे सूर्य अन्धकार से
उवारकर अपनी प्रकाशमय दीप्तियों में सम्बन्ध करा देता है