Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
पादपीठपरामर्शपिष्टकीटवदीहते ।
दीनप्रकृतिरर्थार्थी दुःखाद्दुःखान्तरं व्रजेत् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष सन्तोष धारण नहीं करता ओर अर्थो के लिए लालायित रहता है,
उसकी प्रकृति ठीक उस कीट की तरह दीन बन जाती है, जो कीट जूतों से पहले आहत होकर
रगड़ खा गया है । इस तरह का असन्तुष्ट जीव एक दुःख से दूसरे दुःख की ओर जाता ही है, दुःखों
से छुटकारा नहीं पाता