Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 36
पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग इच्छारहित तुच्छ पुरुष का भोग बन्धन के लिए नहीं होता, एकमात्र इच्छा ही बन्धन है तथा इसका त्याग मुक्ति है, इन सबका वर्णन ।
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- Verse 1ङस सलार में जितने पदार्थ हैं वे सभी एक दूसरे से विरुद्ध और अनेक रूपवाले हैं; परन्तु अविरु…
- Verse 2उसका वह अविरुद्ध रूप क्या ह जिस रुप से वे एक स्वभाव के होते हैं; यह दिखलाते हैं / इस सम्प…
- Verse 3प्रसिद्ध आकाश में गालदुद्धिवेय यक्ष, पिशाच आदि का भीषणरूप तथा बुद्धिमान् पुरुषों की बुद्…
- Verse 4पत्थर में खुदी गई चित्रगत सेना की नाई यह सारा विश्व बाह्य आन्तर विषय से रहित है । अतः विद…
- Verse 5रुपालोक ओर मनन आदि का यानी बाह्य ओर आभ्यन्तर सवका तत्वतः विचार करने पर जब विन्मात्र से अत…
- Verse 6इसलिए ज्ञाता पुरुष का जगत् को जगद्रूप से जानना ही जगत् की भ्रान्ति है तथा जगत् को जगद्…
- Verse 7यह जो ऊपर कहा गया है, इसको विशदरूप से कहते हैं / विस्तृत आकारवाले चिदाकाश के परमाकाशरूप ह…
- Verse 8चूँकि यह जयत् बल्यम्राक्षात्कार से बाध्य हैं, इसलिए भी यह ब्रह्म का विकार नहीं हो सकता,…
- Verse 9जिस न्याय से अभिमन्तव्य के विकार का निरास किया गया है, उछी न्याय से अभिमन्ताके विकार का भ…
- Verse 10त्वत्ता ओर अहन्तादि सब विभ्रम शान्त, शिव तथा शुद्ध ब्रह्मरूप ही हैं अतः आकाश मेँ उत्पन्न…
- Verse 11हे श्रीरामजी, इस तरह जो मेरा उपदेश वचन है उसे भी आप संविदाकाशरूप शून्य ही समझिये, क्योकि…
- Verse 12इस तरह प्रमाण, प्रमेय ओर प्रमाता-इन तीनों के चिन्मात्ररूप सिद्ध होने पर, चित्र, में स्थित…
- Verse 13इच्छा के अभाव में भी जीवन के हुभ्रुत व्यवहार की सिद्धि कत्लाते है/ वही विश्रान्तचित्त जीव…
- Verse 14इस तरह के व्यवहार से जीवन- धारण कर रहे ज्ञानी पुरूष को जगत् की प्रतीति केसे होती हैं, यह…
- Verse 15जिसे यह दृश्यप्रपंच नहीं रुचता और चिन्मात्र अदृश्य ब्रह्म ही अपने हृदय के भीतर रुचता है व…
- Verse 16प्रस्तुत प्रारब्धशेषक्षय के अनुपयोगी शब्दों के उच्चारण से रहित, व्यवहारों में तथा उन व्यव…
- Verse 17नट, भट, वेश्या आदिकों के निवासगृह के समान इच्छारहित, मन के उदय से शून्य, वासनारहित तथा अक…
- Verse 18इच्छा, भय और एषणाओं से शून्य तथा राग और अभिलाषाओं से रहित हो आप लोग दर्वी (कलछी) के तुल्य…
- Verse 19पुनः हे श्रोताओं, आप लोग इच्छारहित, वासनाओं से शून्य तथा अभिमान से रहित हो, वासनाशून्य चि…
- Verse 20इच्छा और वासनाओं से रहित होकर पघ्राणेन्द्रिय के नजदीक ले जाकर गन्धप्रचुर पुष्पों को, वनवा…
- Verse 21इस रीति से न कहे गये भी कर्मेन्द्रियों से प्राप्त विषयों में पहले की नाई निःसाररूप से मन…
- Verse 22जो मनुष्य भोगरूपी विष का आस्वाद लेते हुए प्रसन्नता को प्रतिदिन प्राप्त होता है वह प्रज्वल…
- Verse 23अतः भोगेच्छा का त्याग ही मन की शान्ति में मुख्य हेतु है, यह कहते हैं । भोगों की इच्छा के…
- Verse 24इच्छा के उदय से जैसा दुःख होता है वैसा दुःख नरक में भी प्राणी को नहीं होता और इच्छा की शा…
- Verse 25इच्छामात्र को दुःखदायक चित्त कहते हैं और इच्छा की शान्ति ही मोक्ष कहलाता है । एकमात्र इसी…
- Verse 26जितनी-जितनी और जैसे-जैसे जन्तु को इच्छा उदित होती है, उतनी ही उतनी दुःखों की बीजमुष्टि बढ…
- Verse 27जैसे-जैसे विवेकज्ञान द्वारा जन्तु की इच्छा सूक्ष्म होती-जाती है, वैसे-वैसे दुःखों की चिन्…
- Verse 28और जैसे-जैसे मनुष्य की भोगों में इच्छा रागतः सघन बनती-जाती है वैसे-वैसे दुःखों की चिन्तार…
- Verse 29उसकी चिकित्सा के लिए धैर्यक्रपी पुरुष प्रयत्न ही एकमात्र ओषध है और दूसरा कुछ नहीं; यह कहत…
- Verse 30यदि एक ही काल में सभी इच्छाओं का पूर्णरूप से त्याग न किया जा सके, तो फिर थोड़ा-थोड़ा करके…
- Verse 31जो नराधम, अपनी भोगों की इच्छा को सूक्ष्म बनाने में यत्न नहीं करता, वह प्रतिदिन मानों अपनी…
- Verse 32भोग की इच्छा का आत्यन्तिक नाश तो ज्ञान द्वारा उसके यूल का नाश होने से ही हो सकता है, यह क…
- Verse 33इच्छामात्र ही (7) सुनिये, इस विषय में ययाति ने क्या कहा है : यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्य…
- Verse 34इच्छा की शान्ति में यत्न न होने पर शास्त्रादि के उपदेश भी सव व्यर्थ ही है, यह कहते है/ यद…
- Verse 35जिसको अपने विवेक से सिर्फ इच्छा का अनुसन्धान न करना दुःसाध्य हो रहा है, उसके लिए गुरुओं क…
- Verse 36जैसे व्याघ्र आदि से भरे जंगल में हरिणी की मृत्यु निश्चित है वैसे ही नानाविध दुःखों का विस…
- Verse 37यदि इच्छा से यह मनुष्य लड़कों-जैसा चंचल न बना दिया जाय, तो उसे आत्मज्ञान के लिए बहुत थोड़…
- Verse 38इच्छा का न होना ही निर्वाण है और इच्छासहित रहना ही मनुष्य के लिए बन्धन है, इसलिए यथाशक्ति…
- Verse 39जरा, मरण, जन्मादिरूप करंज और खैर की पंक्तियों का बीज इच्छा ही है । उसको अपने भीतर अभ्यस्त…
- Verse 40जहाँ-जहाँ इच्छा का अभाव है वहाँ-वहाँ मुक्ति है ही जब तक विवेक वैराग्य आदि उपायों की प्राप…
- Verse 41जहाँ-जहाँ इच्छा है वहाँ-वहाँ पुण्य-पापमय दुःखों की राशि तथा निरन्तर फैल रहे करुण क्रन्दन…
- Verses 42–43यदि साधु पुरुष का एक क्षण भी भोगों की इच्छा के अभाव के बिना बीत गया, तो चोरों से जिसका सर…
- Verse 44जैसे-जैसे इस पुरुष, की इच्छा शान्त होती-जाती है, वैसे-वैसे मोक्ष के लिए कल्याणदायक साधन च…
- Verse 45हृदयरूपी वृक्ष से यानी आश्रयभूत लकड़ी से उत्पन्न तीक्ष्ण अग्रभागवाली इच्छारूप दुष्कृत अग्…