Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
हृद्वृक्षजाः स्वसुखदुःखकुबीजकोशौ वैरादिवाश्रयकृतादशुभाच्छुभाच्च ।
आसाद्य दुष्कृतकृशानुशिखाः शितान्ता इच्छाश्छमच्छमिति पुंस्पशुमादहन्ति ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
हृदयरूपी
वृक्ष से यानी आश्रयभूत लकड़ी से उत्पन्न तीक्ष्ण अग्रभागवाली इच्छारूप दुष्कृत अग्नि की शिखाएँ
हृदय के अन्दर स्थित चिदाभासस्वरूप जीवरूप पशु को, उनके आश्रयभूत हृदय में किये गये
पुण्य-पाप से अर्थात् उनके आश्रय में किये गये दोषअपराध से ही उत्पन्न मानों वैर के कारण,
मोहरूपी धुएँ से अन्धा बनाकर तथा स्नेहपाशो से खूब बाँधकर नीचे पटक करके उसके सुख-
दुःखों के कुत्सित बीजों के पात्रभूत अण्डकोशों को चारों ओर से वैगन की तरह खूब पकाती हैँ ।
पकाते समय उससे छांय-छांय शब्द निकलता है