Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
इच्छानिरासरहिते गते साधोः क्षणेऽपि च ।
दस्युभिर्मुषितस्येव युक्तमाक्रन्दितुं चिरम् ॥ ४२ ॥
यथा यथास्य पुंसोऽन्तरिच्छा समुपशाम्यति ।
तथा तथास्य कल्याणं मोक्षाय परिवर्धते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि
साधु पुरुष का एक क्षण भी भोगों की इच्छा के अभाव के बिना बीत गया, तो चोरों से जिसका
सर्वस्व अपहृत हो गया है ऐसे मनुष्य के समान, उसे चिरकालतक रोते रहना ठीक ही है