Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चमत्कुर्वन्त्यथानर्था आवर्ता इव वारिणि । एकस्वभावाः सकला यथा वारितरङ्गकाः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

ङस सलार में जितने पदार्थ हैं वे सभी एक दूसरे से विरुद्ध और अनेक रूपवाले हैं; परन्तु अविरुद्ध और एकरूप से भास्रित होते हैं / इनमें इनका प्रथम रूप तो राग-द्रेष आदि के उदय से दुःख का हेतु होने के कारण अनर्थरप है / परन्तु द्वितीय रूप रय-द्वेष आदि के उपशम द्वारा मोक्ष में अत्यंत उपयोगी है, यह दिखलाते हैं / सांसारिक जितने पदार्थ हैं, वे सबके सब, जल में आवर्त की नाई, भिन्न-भिन्न स्वरूप के होकर पहले चमत्कार पैदा करते हैं यानी इच्छाओं के उत्पादन द्वारा चित्त को भ्रम में डाल देते है। उसके बाद वे राग-द्वेष आदि की उत्पत्ति होने से नरक आदि के रूप में पर्यवसित हो जाते हैं । जैसे सभी तरंग एकमात्र जलस्वरूप हैं, वैसे ही सम्पूर्ण पदार्थ वस्तुतः एक स्वभाव के हैं और एकरूप के होते हुए ये न तो किसी तरह का भ्रम पैदा करते हैं और न किसी तरह का अनर्थ ही पैदा करते हैं

सर्ग सन्दर्भ

पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग इच्छारहित तुच्छ पुरुष का भोग बन्धन के लिए नहीं होता, एकमात्र इच्छा ही बन्धन है तथा इसका त्याग मुक्ति है, इन सबका वर्णन ।