Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
इच्छामात्रं हि संसारो निर्वाणं तदवेदनम् ।
इच्छानुत्पादने यत्नः क्रियतां किं वृथाभ्रमैः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इच्छामात्र ही
(7) सुनिये, इस विषय में ययाति ने क्या कहा है :
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥
यह संसार है और इच्छा का अवेदन असत्त्वापादन यानी अभाव ही निर्वाण है । इसलिए भोगों की
इच्छा उत्पन्न न हो, इसमें आप लोग यत्न करें और दूसरे नानाविध यत्नों से क्या ? मतलब इधर-
उधर भटकते-फिरना बेकार है