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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

तन्मयस्यास्य विश्वस्य न स्वभावविकारिता । विद्यते प्रेक्ष्यमाणापि किमु सास्य भविष्यति ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि यह जयत्‌ बल्यम्राक्षात्कार से बाध्य हैं, इसलिए भी यह ब्रह्म का विकार नहीं हो सकता, यह कहते हैं। चिन्मय इस विश्व की स्वभावविकारिता कुछ भी नहीं है, क्योकि जो विकारिता विचारदृष्टि से देखने पर भी दिखाई नहीं पडती, वह इसकी क्या हो सकती है ?