Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
आत्मनो निर्विवेकस्य यदिच्छापरिपूरणम् ।
संसारविषवृक्षस्य तदेव परिषेचनम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे-जैसे इस पुरुष, की इच्छा शान्त होती-जाती है, वैसे-वैसे मोक्ष के लिए कल्याणदायक
साधन चतुष्टय उसका बढ़ता ही जाता है ॥४३।॥ विवेकशून्य आत्मा की इच्छा को भलीभाँति
भोगों के द्वारा जो पूरण करना है वही संसाररूपी विषैले वृक्ष को सींचना है