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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

सर्वं चिद्व्योम चैवेदं न सत्त्वमहमित्यपि । विकाराद्यस्ति न ज्ञप्तावज्ञप्तिं न लभेत्क्वचित् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस न्याय से अभिमन्तव्य के विकार का निरास किया गया है, उछी न्याय से अभिमन्ताके विकार का भी निरास करना चाहिए, यह कहते है / जो कुछ “तुम, मेँ" इत्यादिरूप यह संसार दिखाई दे रहा है, वह सब सद्रूप चिदाकाश ही है । इस चिदात्मा में अहंकार आदि विकार ओर बाध कुछ भी नहीं है, इसलिए चिति से व्यतिरिक्त कोई पदार्थ कहीं उपलब्ध नहीं हो सकता