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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

पदमाहुः परं सद्यदनिच्छोदयमासितम् । पाषाणपुरुषस्येव चित्रस्थस्येव चासनम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह प्रमाण, प्रमेय ओर प्रमाता-इन तीनों के चिन्मात्ररूप सिद्ध होने पर, चित्र, में स्थित पुरुष के तथा पाषाण के भीतर खुदे गये पुरुष के आसन की तरह, इच्छा और विषय आदि के अभाव से इच्छा के उदय के बिना जो अवस्थान है उसी को ब्रह्मरूप परमपद कहते हैं