Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
सर्वस्यैवास्य विश्वस्य निर्ज्ञेयज्ञेयरूपिणी ।
परमाकाशतारूपं परोपशमसंश्रया ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका वह अविरुद्ध रूप क्या ह जिस रुप से वे एक स्वभाव के होते हैं; यह दिखलाते हैं /
इस सम्पूर्ण विश्व की सत्तामात्ररूप परमाकाशता ही उनका रूप है । और वह सम्पूर्ण विषयरूप
ज्ञेय पदार्थों से निचोड़कर जो सन्मात्र ज्ञेय वस्तु रहती है उसी रूप की है यही कारण है कि वह
परम समाधिरूपी उपशम से ही लक्षित होती है