Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
परमाकाशरूपत्वाच्चिद्व्योम्नो वितताकृतेः ।
न स्वभावविपर्यासः कश्चित्संभवति क्वचित् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो ऊपर कहा गया है, इसको विशदरूप से कहते हैं /
विस्तृत आकारवाले चिदाकाश के परमाकाशरूप होने से उसके स्वभाव में किसी तरह का
कोई परिवर्तन कहीं पर भी संभव नहीं हे । इसमें कारण यह हे कि चिति कदापि जड़ नहीं हो सकती
और न आकाश ही मूर्तिमान् हो सकता है