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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 34

तैंतीसवाँ सर्ग समाप्त चोंतीसवाँ सर्ग दृष्ट पदार्थो की सृष्टि टी जगत्‌ है, यह जगत्‌ अदर्शन से ही नष्ट हो जाता है, इस प्रस्तुत विषय में युक्तियों का वर्णन।

46 verse-groups

  1. Verse 1यह अहक्रात्मक जयत्‌ द्रष्टिकृप केदन से उत्पन्न हुआ है, अतः अद्नष्टिरृप अवेदन से बलह्मचिति…
  2. Verse 2जो इच्छावाला है, वह नित्य दु-खी है और न वह आत्मा ही है, किन्तु इच्छा त्यागर आदि उपायों का…
  3. Verse 3जो अविनाशी आत्मा हैं, उसमे उच्छा आदि का अभिमानी ओर अभिमान का विष्य जग्रत्‌ दोनों की सम्भा…
  4. Verse 4ऐसी स्थिति में वह -अहम्‌“ आदि शब्दों का विषय ही नहीं है, यह कहते हैं / श्रीरामजी, 'अहम्‌'…
  5. Verse 5जब शब्द की यति ही नहीं है, तब कत्व, भोक्तृत्व आदि की तो कथा ही क्या? यह कहते हैं। परमार्थ…
  6. Verses 6–8सव कुछ का बाध करने पर उपदेश आदि का भी बाध हो ही जायेगा, इस परिस्थिति में आपत्ति यह आ जाये…
  7. Verse 9यह ठीक है, परन्तु अदर्शनमात्र से दृश्य की शान्ति कैसे हो सकती है 2 इस पर कहते हैं । जैसे…
  8. Verse 10संकल्प और स्वप्न के सदृश ही ज्ञप्ति जगत्‌ के रूप से भासती है । और वह यद्यपि अनेक अवयवोंवा…
  9. Verse 11अनेकरूप- सा होकर आया हुआ एक आत्मा ही दृष्टि के अज्ञान से विवर्तरूप उदय है यानी संसार है ।…
  10. Verse 12जैसे यह जीव अवयवरहित होता हुआ भी हाथ, पैर आदि अपने अवयवो की कल्पना कर स्वप्नमनोरथ आदि में…
  11. Verse 13यह चितिरूपी कुलाली जब स्मरण करती है, तभी जगत्‌ को देखने लगती है ओर अपने भीतर लाखों की संख…
  12. Verse 14भद्र, चितिरूप होने के कारण यह ब्रह्म ही अपनी सत्ता से सुन्दर जगत्‌ के रूप में ऐसे भासता ह…
  13. Verse 15जिस-जिसका अपने अध्यास से प्रकाश करता है, उस उस को ब्रह्म मानों देखता हे । यद्यपि ब्रह्म अ…
  14. Verse 16किया जाता है, वह तो मायाशबल होने से सर्वशक्ति सम्पन्न होने के कारण ब्रह्म के विषय में नही…
  15. Verse 17भद्र, जगत्‌ न सत्‌ है ओर न असत्‌ है, केवल चितिशक्ति में बहिर्मुखवृत्ति के कारण भासता है य…
  16. Verse 18ऐसा भले ही हो, इससे हुआ क्या इस पर कहते हैं / आत्मा का चेतनत्व और अचेतनत्व स्वाधीन है, इस…
  17. Verse 19समस्त कल्यनाओ के मूलभूत एक अहंकार की ही परीक्षा कर लेने से मिथ्यात्व का निश्चय हो जाने पर…
  18. Verse 20जिस अहंकाररूप यक्ष की वस्तुतः सत्ता ही नहीं है, उसीने इन आप सब लोगों को पराधीन बना डाला ह…
  19. Verse 21ब्रह्म में काकतालीय न्याय से अकस्मात्‌ ही भ्रान्त यह अहंकार ऐसे भासता है, जैसे कि दृष्टि…
  20. Verse 22पूर्वोक्‍्त क्चनो से जो निष्कर्ष निकला, उसे बतलाते हैं / मैं और यह जगत्‌ दोनों ब्रह्मरूप…
  21. Verse 23वर्णित द्ृष्टिछृष्टि कल्पनाओं का अनुवाद कर फलित कहते हैं / सर्वेश्वर होने के कारण यानी मा…
  22. Verse 24बतलाई गई रीति से यह जगत्‌ भी चिद्रूप है, अतः ब्रह्माकाश ही उस रूप से स्वप्ननगर या संकल्पन…
  23. Verse 25जैसे शान्त जल में अप्रकाश्य तरंग आदि हैं, या न खोदे गये काठ में अदृश्य कठपुतलियाँ हैं अथव…
  24. Verse 26जिसका कोई आकार नहीं है, जो अवयवों से रहित है ओर स्वच्छ है, उसमें जो कुछ दिखाई देता है, वह…
  25. Verse 27अलगर सत्ता न होने से भी वह वही है, यह कहते हैं । जैसे पवन का स्पन्दवैचित्र्य पवनसत्ता के…
  26. Verse 28जैसे आकाश में वृक्ष, हाथी, घोड़े आदिका रूप दिखाई पड़ता है, वैसे ही अवयव एवं आकाररहित ब्रह…
  27. Verse 29हे श्रीरामभद्र, परब्रह्म मे यह सारा जगत्‌ वृक्षशाखा के सदृश भासता है। वट आदि वृक्षरूप कार…
  28. Verse 30हे श्रीरामजी, आप भीतर से शान्त, प्रयत्नो से निर्मुक्त, उपाधि से रहित, भ्रम से शून्य होकर…
  29. Verse 31न आप हैं, न हम हैं, न जगत्‌ हे, न आकाश आदि हैं, किन्तु अशेषरूप से परिपूर्ण सर्वोपद्रववर्ज…
  30. Verse 32हे भद्र, चैतन्य से अतिरिक्त किसी भी अन्य स्वरूप का निरूपण न हो सकने से सभी पदार्थ जब एकरू…
  31. Verse 33भद्र, बाह्य पदार्थों के ज्ञान को बन्धन और बाह्य पदार्थो के अज्ञान को मोक्ष जानिये इसलिए आ…
  32. Verse 34तत्वज्ञान की दढता होने पर जड़ अर्थ चेतनरूप ही नहीं होते, यह कहते हैं / द्रष्टा कभी दृश्य…
  33. Verse 35हे भद्र, द्रष्टा, दृश्य की दशा न रहने से जाग्रदवस्था में ही सुषुप्ति के सदृश तथा शरदाकाश…
  34. Verse 36जैसे अज्ञान से पवन और स्पन्दन में भेदप्रतीति होती है वैसे ही अद्वितीय ब्रह्मचैतन्य में अज…
  35. Verse 37जहाँ ब्रह्मरूप वायु से चिति का स्पन्दन होता है वहीं पर सर्ग नाम पड़ जाता है अतः यहाँ जब च…
  36. Verse 38द्वेतवर्शन ही सृष्टिकप हैं, यह दरष्टान्तों से प्रतिपादन करते है/ जैसे बीज अपने भीतर पल्लव…
  37. Verse 39ज्ञानकाल में ही ब्रह्मभावनिष्ठा हो जाती हैं, इसमें भी ये ही दृष्टान्त हैं; यह कहते है / ज…
  38. Verse 40वृक्ष के छः भावविकार भी यहाँ द्ष्टान्त हैं; यह कहते हैं / जैसे चैतन्य के आश्रित भावविकारो…
  39. Verse 41हे श्रीरामजी, निर्विकार परब्रह्ममय ही यह सब जगत्‌ है, अत: विकाररहित, आदि-अन्त शून्य निराम…
  40. Verse 42संकल्पनगर के सदृश यह द्वैत- अद्वैतात्मक जगत्‌ केवल अपना संकल्परूप ही है, अतः अपना संकल्प…
  41. Verse 43भद्र, शून्यता ओर आकाश का भेद जैसा आपने तुच्छ जाना, ब्रह्म और जगत्‌ का भी भेद वैसा ही तुच्…
  42. Verse 44पूर्वसिद्ध महाचैतन्यरूप जो ब्रह्म की सत्ता है, वही अज्ञानसे 'मैं मनुष्य हूँ" इस आकार को ध…
  43. Verse 45इस जगत्‌-रूप ब्रह्म में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता । जल तरंग के सदृश उत्पन्न हुआ भी वास्तव…
  44. Verse 46पदार्थों के रूप से या ब्रह्मरूप से अपने स्वरूप में ब्रह्म ही स्थित है। जैसे कि अपने अवयवो…
  45. Verse 47चिति की वास्तविक स्थिति तो ।निर्विषयक ही है, यह कहते हैं । एक निमेष के अर्धभाग से एक देश…
  46. Verse 48हे श्रीरामजी, शास्त्रज्ञ विद्वान्‌ संवित्‌ का एकरूप तो संक्षुब्ध यानी अज्ञानियों के अनुभव…