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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

नेहास्त्यहं न च जगन्न च ब्रह्मादिशब्दकाः । शान्तस्यैकस्य सर्वत्वात्कर्ता भोक्तेह कः कुतः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जब शब्द की यति ही नहीं है, तब कत्व, भोक्तृत्व आदि की तो कथा ही क्या? यह कहते हैं। परमार्थ में तो, अहम्‌ है, न जगत्‌ है और न ब्रह्म आदि शब्द ही हैं, क्योंकि जो शान्त अद्वितीय वस्तु है, वह तो सर्वात्मकरूप है। ऐसी स्थिति में उसमें कर्तृता ओर भोक्तृत्व कैसी ओर कहाँ से रह सकते हैं ?