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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verses 6–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, verses 6–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

उपदेश्यातिशायित्वात्सर्वापह्नव एव च । कृतोऽयं स च सत्यात्मा त एवाहं विशिष्यते ॥ ६ ॥ अग्रस्थसिद्धसंचारो ज्ञायते नापि दारुणः । यथैकपार्श्वसंसुप्तनरः स्वप्नाभ्रगर्जितम् ॥ ७ ॥ ज्ञप्तौ नास्ति यतस्तेन सिद्धाचारो न लक्ष्यते । स्वभाव इति सर्वेण ज्ञप्तिस्थो ह्यनुभूयते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

सव कुछ का बाध करने पर उपदेश आदि का भी बाध हो ही जायेगा, इस परिस्थिति में आपत्ति यह आ जायेगी कि आत्मज्ञान का कई उपाय ही न बच पायेगा, यह शंका यदि हो, तो भले ही हो, इससे कुछ बियड़ेया नहीं; क्योकि एक तो जिसका हमें उपदेश करना हैं, उस ब्रह्म का तो बाध होता ही नहीं; दूसरी बात यह है कि ब्रह्म में बाधित होनेवाले समस्त अनर्थो की अपेक्षा त्रिकालाबाधित सत्य ग्रत्ययात्मकृप आतिशय है और तीसरी बात यह है कि बाधोपाय से आत्मज्ञान हो जाने के बाद उपदेश आदि की आवश्यकता ही नहीं रहती, इस आशय से कहते हैं / उपदेश्य ब्रह्म में दूसरे अर्थों की अपेक्षा त्रिकालाबाधित्वरूप अतिशय है, इससे सबका बाध होने पर यह आत्मा सत्यस्वरूप ही किया जाता है, ऐसी स्थिति में बाध से वही तुम्हारा यह अहंरूप आत्मा विशिष्टरूप (परिशिष्टरूप) एवं सर्वातिशायी ही सिद्ध किया जाता है